पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य
संदर्भ
- द लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि भारत अब भी वैश्विक स्तर पर मातृ मृत्यु के सबसे अधिक मामलों वाले देशों में शामिल है।
प्रमुख निष्कर्ष
- 2015 के बाद प्रगति की गति धीमी हो गई, जबकि इससे पहले वर्षों में तीव्र गिरावट दर्ज की गई थी।
- वर्ष 2023 में गर्भावस्था और प्रसव से संबंधित कारणों से विश्वभर में लगभग 2.4 लाख महिलाओं की मृत्यु हुई।
- इनमें से भारत में लगभग 24,700 मृत्यु हुईं, जिससे भारत नाइजीरिया, पाकिस्तान और इथियोपिया के साथ उच्च भार वाले देशों में शामिल है।

- 1990 से मातृ मृत्यु में उल्लेखनीय कमी आई है, जिसका श्रेय बेहतर जागरूकता, संस्थागत प्रसव और सरकारी कार्यक्रमों को जाता है। हालांकि राज्यों के बीच प्रगति असमान है।
- केरल और तमिलनाडु वैश्विक लक्ष्यों के करीब हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मातृ मृत्यु दर अब भी अधिक है।
- भारत में मौतें अब भी मुख्यतः रोके जा सकने वाले कारणों जैसे रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप संबंधी विकार, संक्रमण और पूर्व-स्थित बीमारियों से जुड़ी जटिलताओं के कारण होती हैं।
मातृ मृत्यु क्या है?
- मातृ मृत्यु: गर्भावस्था के दौरान या गर्भावस्था समाप्त होने के 42 दिनों के अंदर किसी भी कारण से होने वाली महिला की मृत्यु, जो गर्भावस्था से संबंधित या उससे बढ़ी हुई हो, लेकिन आकस्मिक या असंबंधित कारणों से नहीं।
- मातृ मृत्यु अनुपात (MMR): प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर मातृ मृत्यु की संख्या।
- मातृ मृत्यु दर: 15-49 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में प्रति लाख महिलाओं पर मातृ मृत्यु की संख्या, जिसे सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के तहत रिपोर्ट किया जाता है।
- सतत विकास लक्ष्य (SDG) 3.1: वर्ष 2030 तक वैश्विक मातृ मृत्यु अनुपात को 70 प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों से कम करना।
भारत की प्रगति (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5, 2019-21)
- भारत में MMR 2014-16 में 130 से घटकर 2018-20 में 97 प्रति 1,00,000 जीवित जन्म हो गया।
- संस्थागत प्रसव राष्ट्रीय स्तर पर 2015-16 में 79% से बढ़कर 2019-21 में 89% हो गया।
- केरल, गोवा, लक्षद्वीप, पुडुचेरी और तमिलनाडु में संस्थागत प्रसव 100% है, जबकि 18 अन्य राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में यह 90% से अधिक है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 87% और शहरी क्षेत्रों में 94% प्रसव संस्थानों में होते हैं।

भारत के सामने चुनौतियाँ
- उच्च आउट ऑफ़ पॉकेट व्यय (OOPE): नीतिगत प्रयासों के बावजूद परिवारों को आपातकालीन स्थिति में जांच, दवाइयों और निजी सेवाओं का व्यय उठाना पड़ता है।
- सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएँ: लैंगिक असमानता, कम शिक्षा स्तर, महिलाओं की सीमित निर्णय लेने की शक्ति और मातृ देखभाल से जुड़ा कलंक समय पर उपचार में बाधा डालते हैं।
- उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था में वृद्धि: देर से मातृत्व, मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और गर्भधारण के बीच कम अंतराल जैसी प्रवृत्तियाँ जोखिम बढ़ाती हैं।
- दूरदराज़ क्षेत्रों में कमजोर अवसंरचना: ग्रामीण, आदिवासी और पहाड़ी क्षेत्रों में आपातकालीन प्रसूति देखभाल, विश्वसनीय परिवहन एवं रक्त भंडारण सुविधाओं की कमी है।
मातृ मृत्यु दर कम करने हेतु सरकारी पहल
- जननी सुरक्षा योजना (JSY): 2005 में शुरू की गई, इसका उद्देश्य मातृ एवं नवजात मृत्यु दर को कम करना है। यह विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं में संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देती है।
- प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY): महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा संचालित मातृत्व लाभ कार्यक्रम।
- इसमें प्रथम जीवित संतान के लिए ₹5000 की सहायता दी जाती है।
- मिशन शक्ति (PMMVY 2.0): दूसरे बच्चे के लिए अतिरिक्त नकद प्रोत्साहन, यदि वह बच्ची हो।
- प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA): 2016 में शुरू, प्रत्येक माह की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं को निःशुल्क गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व देखभाल उपलब्ध कराता है।
- लक्ष्य (LaQshya): 2017 में शुरू, प्रसव कक्ष और मातृत्व ऑपरेशन थिएटर में देखभाल की गुणवत्ता सुधारने हेतु।
- क्षमता निर्माण: ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञों की कमी दूर करने हेतु MBBS डॉक्टरों को एनेस्थीसिया और प्रसूति देखभाल (C-section सहित) में प्रशिक्षित किया जाता है।
- मातृ मृत्यु निगरानी समीक्षा (MDSR): संस्थानों और समुदाय स्तर पर लागू, ताकि सुधारात्मक कार्रवाई की जा सके।
- ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस (VHSND): मातृ एवं शिशु देखभाल और पोषण हेतु मासिक आउटरीच गतिविधि।
- RCH पोर्टल: गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की नाम-आधारित वेब ट्रैकिंग, ताकि उन्हें नियमित एवं पूर्ण सेवाएँ मिल सकें।
| मातृ स्वास्थ्य में नवाचारमध्य प्रदेश का ‘दस्तक अभियान’: सामुदायिक-आधारित पहल, जो मातृ स्वास्थ्य जोखिमों की शीघ्र पहचान और समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप सुनिश्चित करती है।तमिलनाडु का आपातकालीन प्रसूति देखभाल मॉडल: सुदृढ़ रेफरल प्रणाली, जो गर्भवती महिलाओं को समय पर आपातकालीन देखभाल उपलब्ध कराती है। |
आगे की राह
- भारत ने मातृ मृत्यु दर कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है और 2020 तक MMR को 100 से नीचे लाने का राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लक्ष्य प्राप्त कर लिया है।
- हालाँकि, 2030 तक SDG लक्ष्य प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।
- स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करना, मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों का विस्तार करना और सामाजिक-आर्थिक बाधाओं को दूर करना देश में मातृ मृत्यु दर को और कम करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
स्रोत: TOI
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संक्षिप्त समाचार 30-03-2026